जब ‘खाकी’ के हाथों ही नागरिक नग्न कर प्रताड़ित हो — तो न्याय व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है

जब ‘खाकी’ के हाथों ही नागरिक नग्न कर प्रताड़ित हो — तो न्याय व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है

पूर्व आईपीएस लोकेश्वर सिंह दोषी करार, लेकिन क्या यह सिर्फ एक “प्रशासनिक कार्रवाई” का मामला है?

देहरादून / नवक्रान्ति समाचार 

उत्तराखंड में एक बार फिर यह साबित हुआ है कि पद, वर्दी और सत्ता का दुरुपयोग जब अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो सबसे पहले नागरिक का सम्मान, उसका अधिकार और उसकी सुरक्षा ही कुचली जाती है।
और यही हुआ पिथौरागढ़ में—जिसके लिए राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने अब साफ शब्दों में कहा है:
पूर्व पुलिस कप्तान लोकेश्वर सिंह ने एक शिकायतकर्ता को नग्न कर मारपीट की और यह आरोप “सिद्ध” है।

लेकिन बड़ी बात यह नहीं कि दोष सिद्ध हुआ।
बड़ी बात यह है कि यह सब एक एसपी के दफ्तर में हुआ—जहाँ कानून लिखा जाता है, पढ़ा जाता है और लागू किया जाता है। और उसी जगह कानून को रौंद भी दिया गया।

—क्या यह सिर्फ ‘एक घटना’ है—या खूंटी से टंगी वह तस्वीर, जो हमारी पूरी पुलिस व्यवस्था का असल चेहरा दिखाती है?

6 फरवरी 2023
एक आम नागरिक—लक्ष्मी दत्त जोशी—पुलिस लाइंस की गंदगी की शिकायत लेकर एसपी के पास पहुँचता है।
लेकिन शिकायत सुनने के बजाय उसे कैमरों से दूर कमरे में ले जाया गया

नग्न किया गया

मारा गया

धमकाया गया
मेडिकल कहता है—चोटें ताज़ा थीं।
साक्ष्य कहते हैं—कहानी झूठ नहीं है।
प्राधिकरण कहता है—यह “गंभीर कदाचार” है।

लेकिन सिंह का पक्ष?
कागजों में बहाने, बयान में विरोधाभास, और आरोपों को झुठलाने के लिए कोई साक्ष्य नहीं।

फिर भी — वे कभी प्राधिकरण के सामने पेश नहीं हुए।
शायद इसलिए कि खाकी को भरोसा है—वह सवालों से बड़ी है।

—इस्तीफा देकर बचने की कोशिश या पहले से तय रणनीति?

तथ्य साफ़ कहते हैं—
जब जांच तेज हुई, तभी लोकेश्वर सिंह ने अक्टूबर 2025 में अचानक इस्तीफ़ा दे दिया।
कारण बताया — संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्था में चयन।

यह संयोग है या रणनीति?
क्योंकि इस्तीफ़ा मंजूर होने के बाद कार्रवाई की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।

और सवाल यह भी—
क्या किसी अधिकारी को “अंतरराष्ट्रीय नौकरी” मिल जाना उसे घरेलू कदाचार से मुक्त कर देता है?

—राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने तो अपना काम कर दिया—अब असली परीक्षा सरकार की है

प्राधिकरण ने निर्देश दिए हैं—
अनुशासनात्मक कार्रवाई कीजिए।

लेकिन क्या सिर्फ यही काफी है?
क्या “अनुशासनात्मक कार्रवाई” उस अपराध के लिए पर्याप्त है जिसमें—

मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ

एक नागरिक को निर्वस्त्र कर प्रताड़ित किया गया

संवैधानिक अधिकारों की धज्जियाँ उड़ाई गईं

और विभाग की साख को चोट पहुँची

कानून कहता है—यह एक गंभीर आपराधिक कृत्य है।
समाज कहता है—यह अपराध है।
नैतिकता कहती है—यह विश्वासघात है।

तो फिर सवाल उठना जरूरी है:
सरकार क्या सिर्फ कार्रवाई करेगी या मुकदमा भी चलेगा?
क्या यह फाइलों में दफ्न हो जाएगा या सजा का रास्ता पकड़ेगा?
क्या लोकेश्वर सिंह को UN में नौकरी करने दी जाएगी?

—और सबसे बड़ा सवाल—कितने ‘जोशी’ अभी तक बोल ही नहीं पाए?

यह घटना एक मिसाल है, लेकिन सच्चाई कहीं गहरी हो सकती है।
कोई नहीं जानता कि—
इन तैनातियों के दौरान कितने लोग डर गए, दबे, अपमानित हुए या चुप करा दिए गए।

क्योंकि एक बात यह मामला साफ कर देता है:
जब शक्ति बिना जवाबदेही के होती है—तो वर्दी इंसाफ नहीं, अत्याचार का औजार बन जाती है।

—न्याय अब सिर्फ आदेश नहीं–परीक्षण है

राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने सत्य पर मुहर लगा दी है।
अब बारी है—
सरकार की, पुलिस विभाग की, और उस व्यवस्था की—जो अक्सर अपने ही लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में हिचकिचाती है।

अगर यह केस भी किसी दराज़ में रख दिया गया,
तो एक और “लोकेश्वर सिंह” तैयार होने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा।

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